Call for Papers/Workshop/New Issue Release
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नवीनतम शोध पत्र

मुख्य पृष्ठ, सूची एवं संपादकीय

प्रो. आशा शुक्ला

आशा पारस फॉर पीस एंड हारमनी फाउंडेशन, भारत की स्थापना समाज में व्याप्त असमानताओं, लैंगिक भेदभाव, हिंसा, अशिक्षा एवं सामाजिक असंतुलन जैसी जटिल चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए की गई है। इस संस्था का मूल उद्देश्य एक ऐसे समाज का निर्माण करना है...

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मध्यस्थ दर्शन सह-अस्तित्ववाद के आलोक में समग्र मानव विकास एवं परिवारमूलक स्वराज्य व्यवस्था

देव प्रकाश शर्मा एवं सुरेंद्र पाठक

ए. नागराज (2010, 2015) द्वारा प्रतिपादित मध्यस्थ दर्शन, सह-अस्तित्ववाद के सिद्धांत पर आधारित एक समग्र दार्शनिक ढांचा प्रस्तुत करता है, जो मानव गतिविधियों, सामाजिक संरचना एवं वैश्विक व्यवस्था के लिए एक मूल्य-संश्लेषित, समन्वित एवं मानवीय विकल्प प्रदान करता है…

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पंजाब में दलित अस्मिता और सामाजिक न्याय: डेरों की भूमिका का समाज-आध्यात्मिक विश्लेषण

गुरपिंदर कुमार

पंजाब में डेरा करिश्माई संतों द्वारा संचालित महत्वपूर्ण सामाजिक-आध्यात्मिक संस्थान हैं, जिन्होंने विशेष रूप से दलित समुदायों के बीच वैकल्पिक धार्मिक और सामाजिक पहचान के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यद्यपि सिख धर्म समानता और जाति-विरोध के सिद्धांतों पर आधारित…

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मध्यस्थ दर्शन में सह-अस्तित्व और परिवार-मूलक व्यवस्था: समाधान, समृद्धि एवं न्याय का दार्शनिक विमर्श

गौरीकांता साहू एवं सुनील छानवाल

मानव सभ्यता के विकास में परिवार सदैव समाज की मूलभूत इकाई के रूप में प्रतिष्ठित रहा है। आधुनिकता, भौतिकवाद और अतिशय व्यक्तिवाद के प्रभाव से पारिवारिक संरचना एवं संबंधों में गंभीर असंतुलन उत्पन्न हुआ है, जिससे मानवीय मूल्यों का क्षरण दृष्टिगोचर होता है...

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सामाजिक उत्तरदायित्व की शिक्षा: राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का एक महत्त्वपूर्ण आयाम

महेश नारायण दीक्षित

सामाजिक उत्तरदायित्व एक महत्वपूर्ण शैक्षिक लक्ष्य है, जो विद्यार्थियों में नैतिक जागरूकता, नागरिक सहभागिता, सहानुभूति तथा सामाजिक और पर्यावरणीय कल्याण के प्रति प्रतिबद्धता पर अवलम्बित होता है। विद्यार्थीयो में सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति जगरूकता एवं प्रतिबद्धता…

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प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के संदर्भ में पुरातात्त्विक एवं ऐतिहासिक डिजिटल स्रोतों का विश्लेषणात्मक अध्ययन

मनोज कुमार सक्सेना एवं आशीष कुमार

प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय प्रथम आवासीय एवं संगठित विश्वविद्यालयों में से एक था। तीसरी शताब्दी से 13 वीं शताब्दी तक एशिया में शिक्षा, दर्शन, बौद्ध अध्ययन तथा वैज्ञानिक ज्ञान के विकास रूप में प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इस अध्ययन का...

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फुटपाथ बाजारों का धार जिले के अनुसूचित जनजाति समुदाय की आजीविका पर प्रभाव का अध्ययन

मनीषा सक्सेना एवं मनोज कुमार गुप्ता

भारतीय अर्थव्यवस्था में साप्ताहिक हाट-बाजार, फुटपाथ बाजार, फेरी (घूम-घूम कर) व्यापर करने वाले छोटे और अस्थाई बाजारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. यह एक रूप से असंगठित क्षेत्र की श्रेणी में आते हैं. इस क्षेत्र में कार्यरत जनसंख्या का अधिकांश हिस्सा आर्थिक रूप से कमजोर…

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राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के परिप्रेक्ष्य में पूर्व प्राथमिक स्तर पर विद्यार्थियों के शारीरिक एवं शैक्षणिक विकास में आँगनवाड़ी केंद्रों की भूमिका एवं चुनौतियाँ

पप्पू एवं शुभ्रा पी० काण्डपाल

प्रस्तुत शोध-पत्र राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के परिप्रेक्ष्य में पूर्व प्राथमिक स्तर पर आँगनवाड़ी केंद्रों की बहुआयामी भूमिका का विश्लेषण करता है। 500 आँगनवाड़ी कार्यकर्ताओं (ग्रामीण: 290, शहरी: 210) पर आधारित इस सर्वेक्षण शोध में 5-बिंदु लाइकर्ट स्केल पर निर्मित…

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तुलसीकृत रामचरितमानस में वनवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक समरसता का विश्लेषण

रामशंकर

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस भारतीय समाज, संस्कृति और लोक जीवन का एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसमें वनवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक समरसता का अत्यंत संवेदनशील और सम्मानजनक चित्रण किया गया है। तुलसीदास ने वनवासी पात्रों जैसे निषादराज...

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अस्तित्ववाद और मानव जीवन की संपूर्णता: मध्यस्थ दर्शन एवं नई शिक्षा नीति 2020 के आलोक में एक सामाजिक-सांस्कृतिक अध्ययन

सोनिका निम एवं सुरेन्द्र कुमार पाठक

मानव जीवन के अर्थ, उद्देश्य और पूर्णता का प्रश्न सदैव से दार्शनिक विमर्श का केंद्र रहा है। आधुनिक युग में अभूतपूर्व तकनीकी प्रगति और भौतिक समृद्धि के बावजूद व्यक्ति के भीतर अकेलेपन, पहचान-संकट, चिंता और गहरी अपूर्णता की अनुभूति निरंतर बढ़ रही है। पश्चिमी अस्तित्ववाद — जैसा कि…

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थारू जनजातीय लोक संस्कृति एवं लोक जीवन (बलरामपुर एवं सिद्धार्थनगर जनपद के विशेष संदर्भ में)

वंदना गुप्ता

जनजाति' की आदर्श परिभाषाएँ कुछ बनी-बनाई धारणाओं तक सीमित हैं, जैसे कि जनजातीय समाज संस्कृति से बंधा हुआ, गैर-स्तरीकृत, जातिविहीन, वर्गविहीन, क्षेत्रीय रूप से सीमित, अलग-थलग और सजातीय समाज होता है। लेकिन सामाजिक परिवर्तन के इस आधुनिक युग में जहाँ लोग…

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आदिवासी विकास की अवधारणा, लक्ष्य और वर्तमान स्थिति

वी. के. श्रीवास्तव

यह लेख भारत में आदिवासी विकास की अवधारणा, उसके लक्ष्यों तथा वर्तमान स्थिति का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें आदिवासी शब्द की उत्पत्ति, उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक विशेषताओं तथा विविध जनजातीय समुदायों की भिन्नताओं को स्पष्ट किया गया...

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